अनुभूति 1
जब देह थी उर्जा से लबरेज,और भावनाओं का समंदर मारता था हिलोरें कच्ची देह के भीतरचेहरा साफ साफ,व नाक नक्श थे,ठिकानों परदुनियां थी मुटठी में,मां बाप रिश्ते नातेसपनों से भरा था आसमानउडते उडते थकी देह तलाशतीएकांत को,जो हो जाया करताआधी रात का सूरज या फिरबेटी...
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वंदना शुक्ला
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[08 Jun 2010 00:32 AM]



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