सांझ ढलती गयी
सांझ ढलती गयी रात बढती गयीदीप को मैं जला राह लखता रहा।हो गयी भोर आँखें खुली ही रहीतुम न जाने कन्हन थे की आये नहीं । ।दर्द मेरा ह्रदय में सजा ही रहातेरी यादों में जीवन घुलाता रहासांझ ढलती गयी रात बढती गयी।दीप को मैं जला राह लखता रहा । ।दुश्मनी कब की थी...
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JEEVAN SANGEET
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[09 Jun 2010 07:07 AM]



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