SANKALP MERI JINDAGI
खेल-कौतुक में बितायी जिंदगीआज बिन पतवार बढती जिंदगीछोड़ कर तट बढ़ रही मंझधार में क्या पता किस घात होगी जिंदगी . . थाह पानी कठिन है गहराई की नाव बढती जा रही है धार परनिकल आया हूँ भंवर को झेलकरअब चढ़ाई सामने है ज्वार पर ..संभलते ही फंस गयी है जिंदगीजोश...
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JEEVAN SANGEET
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[12 Jun 2010 07:33 AM]



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