त्याग दो ऐसा त्रिभूज
त्रिभुज जहाँ कहीं बने , समझ उसे त्रिशूल ।दिन-दिन भारी कष्ट दे , कभी न कर तू भूल ।।कभी न कर तू भूल, हो मुकदमा बिना बात।धन का होवे धूल, धूल उड़ेगी दिन-रात।।कह ‘वाणी’ कविराज, जेल जाय अग्रज-अनुज।बिताय चैदह साल, त्याग दे ऐसा त्रिभुज।।शब्दार्थ: त्रिशूल = तीन...
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[13 Jun 2010 23:58 PM]



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