कविता :एक मकान में चार दुकान

BAL SAJAG एक मकान में चार दुकानएक मकान में चार दुकान ।बनते थे सब में पकवान ॥ चारो दुकानों में थे मोटे हलवाई ।करते-रहते थे दिन-रात लड़ाई ॥लड़ाई में क्या होते थे मुद्दे ।दुकान में सौदे हो जाते थे मद्दे ॥चारो दुकानों में सन्डे को होता था अवकाश ।उस दिन चारो हलवाई नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer BAL SAJAG
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[13 Jun 2010 23:30 PM]

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