वह अनजानी जगह
दूर बॉटल बुरूसशीशम, अमलतास और गुलमोहरनिगाहें लौट आती हैंइनकी खुशबूऔर आकर्षण सेसराबोर होकरमैंयहाँ दूर बैठा हूँक्या सचमुचहाँ भी, नहीं भीतो फिर?अनजानीअनपहचानीधुँधलाई-सी एकगुफा-सी मेंअरे! यह तो मन है किसी काकिसका?खोज रहा हूँ, उसी कोअथक, अनवरत ...........
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डॉ. राजेश नीरव
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[13 Jun 2010 22:57 PM]



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