प्रियतम होते पास अगर

मनोरमा प्रियतम होते पास अगरमिट जाती है प्यास जिगरढ़ूँढ़ रहा हूँ मैं बर्षों सेप्यार भरी वो खास नजरटूटे दिल की तस्वीरों का देता है आभास अधरगिरकर रोज सम्भल जाएं तोबढ़ता है विश्वास मगरतंत्र कैद है शीतल घर मेंजारी है संत्रास इधरलोगों को छुटकारा दे दोबन्द करो बकवास... [पूरी पोस्ट]
writer श्यामल सुमन

कविता

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[13 Jun 2010 21:45 PM]

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