जाति पूछिए साधु की

मीठी मिर्ची मै भी कितना उजबक था जो 'जाति' को बुराई मानता था और कभी-कभार उसके खिलाफ बोलकर खुद को भगतसिंह। गाँधी, लोहिया, मार्क्स आदि ने ऐसा दिमाग खराब कर दिया था कि 'जाति' होने से घिन होने लगी थी। पढ़-लिखकर खुद को आदमी मानने लगा था। मै कैसा बंदर हो गया था कि जाति-धर्म... [पूरी पोस्ट]
writer ओम द्विवेदी
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[13 Jun 2010 16:01 PM]

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