मेरे अतीत का आँगन
आह !!! कैसा है यह दुःसाहस, देखता हूँ मुड़कर मैं, अपने अतीत के उस खण्डहर को, अपने आँगन में, सर झुकाए मैं खड़ा था । टूट रहा था विश्वास, खत्म हो रहे थे सारे सम्बन्ध, मेरे मन के उस आँगन में । और मिट चुकी थी भविष्य की रेखाऐं मेरे छोटे-छोटे हाथों से । मुझे याद...
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चंदन कुमार झा
आँगन
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[13 Jun 2010 14:19 PM]



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