उस मोड़ से शुरु करें ये ज़िंदगी- जगजीत सिंह
तुम्हें भूल जाऊँ? तुमसे इजाज़त लेकर भूलने की कोशिश करती हूँ, रोज़ और फिर सच भूल जाती हूँ, यह सोच कर कि तुम्हें भूल गई। देखो! भूल ही तो गई हूँ तुम्हें। बस मेरे साथ आना छोड़ दो, जहाँ कहीं भी जाती हूँ। ये मेरी उँगली पकड़े कहाँ-कहाँ घूमते हो तुम? फिर एक...
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मानसी
कुछ यूँ ही
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[13 Jun 2010 10:55 AM]



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