ब्रह्मराक्षस

मुक्तिबोध शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़ परित्यक्त सूनी बावड़ीके भीतरीठण्डे अंधेरे मेंबसी गहराइयाँ जल की...सीढ़ियाँ डूबी अनेकोंउस पुराने घिरे पानी में...समझ में आ न सकता होकि जैसे बात का आधारलेकिन बात गहरी हो।बावड़ी को घेरडालें खूब उलझी हैं,खड़े हैं मौन औदुम्बर।व... [पूरी पोस्ट]
writer Rangnath Singh
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[13 Jun 2010 09:44 AM]

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