कविता- पेड़ से गिरे पत्ते

रतन चंद 'रत्नेश' पेड़ पर सेजहाँ-जहाँ से गिरे थे पत्तेपतझड़  मेंवहाँ-वहाँ फूटती कोपलों से झाँक रहें हैं नन्हें -नन्हें कोमल चिकने पात ...पत्ते जो झडकर  गिरे थे पसरे थे धरती पर दूर-दूर तक कुछ जले, कुछ मिट्टी में दफ़न हुए न वे हिंदू थे, न मुसलमानफिर भी इसी मिट्टी में... [पूरी पोस्ट]
writer रतन चंद रत्नेश
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[13 Jun 2010 09:42 AM]

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