शब्दहीन
पानी का उफान तेज था अंदर भी, बाहर भी फर्क एक ही था बाहर का उफान सबको दिखता था अंदर का पानी अंदर ही बहा उसे कौन बांधता न पत्थर, न बांध अंदर का तूफान खुद ही थमता है खुद ही से थमता है अंदर की आवाज भी अंदर के कान ही सुनते हैं वे ही जानते हैं अंदर के मौसम का...
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डॉ वर्तिका नन्दा
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[13 Jun 2010 07:30 AM]



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