“टीस” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
(नोट-कलाई में मोच आ जाने के कारण केवल आपको पढ़ ही रहा हूँ! चाह कर भी टिप्पणी नही कर पा रहा हूँ! किसी तरह से कृतिदेव मे लिखी हुई इस रचना को किसी से यूनिकोड में बदलवा कर यह रचना लगवा दी है!) टीस उठ रही है तन-मन में, पोर-पोर में दर्द भरा है! बाहर से...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
गीत
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[13 Jun 2010 07:13 AM]



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