रामकृष्ण अवस्थी और कश्यप भार्गव

ओम और कमला कुछ घँटों के बाद तुम्हें गये तेईस वर्ष पूरे हो जायेंगे. अब तो ऐसा लगता है कि मैं सुनहरी धूप में झरने के नीचे मुँह खोले लेटी थी और जीवन का अमृत स्वयं ही मेरे मुँह में गिर रहा था कि सहसा वह झरना सूख गया और मेरा मुँह खुला ही रह गया. क्या मनुष्य को गहरा... [पूरी पोस्ट]
writer Sunil Deepak

मित्र व्यक्तिगत

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[13 Jun 2010 04:04 AM]

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