वक़्त से हाथ मिला लिया
हिन्दयुग्म से बैरंग लौटी मेरी रचना ,...
जीने की आरजू ने हर गम भुला दियारोये बहुत थे हम मगर , चाहत को सुला दिया भारी पड़ता है इश्क तो गमे-रोज़गार परन हवा निवाला बनती , क्या पी के जी रहतेउतरे जो हम जमीं पर , टुकड़ों ने सिला दियाजीने की आरजू ने हर गम भुला...
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शारदा अरोरा
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[13 Jun 2010 03:09 AM]



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