आज इच्छाएं मेरी उड़ रही है तितली बनकर

राष्ट्र सर्वोपरि आज इच्छाएं मेरी उड़ रही है जैसे उडती तितलियाँ हो,वो ठहरती ही नहींकिसी पलकिसी एक फूल  पर और ये मेरा नादाँ मनकर रहा है कोशिश पकड़ने की उन तितली बनी इच्छाओं कोएक अबोध बालक की तरह और फिर चाहता की कैद कर ले उन्हेंजिससे वो न उड़ सके दुबारा,पर हर बार की तरह... [पूरी पोस्ट]
writer sanu shukla

कविता

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[13 Jun 2010 02:31 AM]

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