'मेरी आवारगी'
(पुनः )--------------------कोई फितरत से आवारा,कोई तबीयत से आवारा,किसी को आवारगी का शौक,मैं मजबूरी में आवारा,यूं थे, रास्ते बहुत,न समझा मैं, किधर जाऊं, था बस, मंजिलों का खौफ, जहाँ जाऊं, जिधर जाऊं, बचा जब कोइ न चारा,तो घूमा बन के बंजारा,किसी को आवारगी का...
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योगेश शर्मा
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[13 Jun 2010 01:00 AM]



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