बिखरे हैं मसले हुए इंसानियत के फूल, जो पास ही तहज़ीब के बिस्तर पर पड़े हैं .......

काव्य मंजूषा मत पूछो हमें कौन हैंकिस ओर चले हैं,समझो कि मुसाफिर हैंऔर सराय में पड़े हैं,राह रोक लेते हैं   कुछ पहचाने से लोग,काम जिनके छोटे हैंपर नाम बड़े हैं,हर लम्हा हम मौत कीसरहद पर खड़े हैं,तूफ़ान से खेल लेतेकभी बवंडर से लड़े हैं,बिखरे हैं, मसले हुए इंसानियत के... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[12 Jun 2010 18:10 PM]

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