फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !
सोचा था चलेगें सिन्धु की थाह लेने नीली अतल गहराइयों की स्वयं पर एक छाप लेने । था स्वप्न चलेंगे एक बार निरखने विशद अनुभूतियॊं के गहन कानन लता कुंज गह्वर , चुनेगें कुछ पुष्प चेतना की सजावट को संघनित आर्द्र भाव अवगुंठनों के। अजाने मन की हुलसती एक चाहना थी...
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आर्जव
कविता
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[12 Jun 2010 15:28 PM]



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