फिर उथले किनारों से ही लौट आये हैं !

आर्जव सोचा था चलेगें सिन्धु की थाह लेने नीली अतल गहराइयों की स्वयं पर एक छाप लेने । था स्वप्न चलेंगे एक बार निरखने विशद अनुभूतियॊं के गहन कानन लता कुंज गह्वर , चुनेगें कुछ पुष्प चेतना की सजावट को संघनित आर्द्र भाव अवगुंठनों के। अजाने मन की हुलसती एक चाहना थी... [पूरी पोस्ट]
writer आर्जव

कविता

views
23
upvote
3
downvote
0
rating
3
comments
16
[12 Jun 2010 15:28 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix