ढूँढती इंसाफ़ को वो आँख अब भी है खुली...
थी कभी छत पर मेरे कुछ धूप आकर तैरती...और नीचे छाँव भी थी सुस्त थोड़ी सी थकी...छाँव के कालीन पर नन्हा खिलौना रेंगता...कुछ उछलती कूदती साँसों को मुझपे फेंकता...हाँ वो बचपन था कभी कुछ झूमता कुछ डोलता...आँख मून्दे मुँह सटाये मुझसे क्या क्या बोलता....फिर तभी...
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दिलीप
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[12 Jun 2010 12:44 PM]



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