कविता के विरोध में
भाव पंचर हो गये हैं ! मन न जाने क्यों अपना मसौदा कविता को न देना नहीं चाहता है बहुत कुछ पास उसके कहने को , सुनाने को कविता को देने को कविता हो जाने को लेकिन वह दबाये बैठा है सटकाये बैठा है ! ! ! वह नाराज है शायद कविता से कि वह बड़ी डिप्लोमेट हो गयी है !...
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आर्जव
कविता
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[12 Jun 2010 06:51 AM]



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