कुछ बीती हुई शामों हिसाब और एक अफ़सोस ?
दीवारों पर उनके पते लिखे होते हैं अक्सर जिनके मिलने की आस बाकी नहीं होती. महीनों और सालों तक मुड़ा-तुड़ा, बदरंग पता लिखा पन्ना किसी उम्मीद की तरह जेब में छुपाये घूमते रहते हैं मगर एक दिन कहीं खो जाया करता है. मेरी उलझनें तुमसे हुई मुहोब्बत जैसी हो जाती है....
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hathkadh
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[12 Jun 2010 05:46 AM]



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