मेरा अस्तित्व [कविता] - डॉ. प्रीति जैन
बूँद पकड़ती हूँ मैं ऊँगली के सिरे पर फिर निहारती हूँ उसे चमकते हुए प्यार भी ऐसा ही है तुमसे लिपटा तुमसे मिलता और तुमसे पनपता और फिर मेरी आँखों में समाता| अतिरिक्त......
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[12 Jun 2010 03:30 AM]



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