“जाना अपने घर, कल - परसो!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

uchcharan ♥ एक पुरानी रचना ♥नभ में कितने घन-श्याम घिरे, बरसी न अभी जी भर बदली। मुस्कान सघन-घन दे न सके,  मुरझाई आशाओं की कली।------------प्यासा चातक, प्यासी धरती, प्यास लिए, अब फसल चली। प्यासी निशा - दिवस प्यासे, प्यासी हर सुबह-औ-शाम... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

कविता

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[12 Jun 2010 01:32 AM]

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