यह कैसा स्पंदन है... यह कैसी अनुभूति है... यह कैसा भय है...

काहे को ब्याहे बिदेस.... वो बचती फिरती थी सौरभ से... जैसे राहगीर बचते है रास्ते में आ जाने वाली बिल्ली से... दो कमरों के सरकारी क्वाटर में रोज आने वाले मेहमान से कितना बचा जा सकता है.. पिछले दो बरस से शाम को उसका घर आना उसी तरह निश्चित था, जैसे शाम को सूरज का छिपना, सुबह को सभी... [पूरी पोस्ट]
writer neera
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[11 Jun 2010 21:28 PM]

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