कर भी लो अब ज़रा मुझसे खुल कर बातें.....

काव्य मंजूषा यूँ हीं होतीं हैं कभी बेहुनर बातेंदिल करता हैकभी नगमाग़र बातेंपलकें झुक जातीं है  और बन जातीं है ज़बान फिर कर ही जातीं हैं  कभी अश्कतर बातेंतेरी ख़ामोशी अब  जानलेवा होती जाती है कुछ तो करो मुझसे भी  हमसफ़र बातेंदिल की बात कहींदिल... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[11 Jun 2010 18:50 PM]

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