मेरे मित्र वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद प्रवीण की एक कविता: दिल्ली से योगेश गुलाटी
प्रिय श्री योगेश जी, मजदूर दिवस का उपहार स्वीकार करें... हम, कितने बेचारे हैं ? लाचार, थके-हारे... युद्ध में पराजित सा योद्धा । चले थे, दुनिया को दीया दिखाने, मगर, भूल गए थे... कि, हम वहां खड़े हैं, तलहटी में, जहां कभी रौशनी पहुंच ही नहीं सकती । अंधेरे...
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योगेश गुलाटी
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[11 Jun 2010 17:25 PM]



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