मेरी खुद से ही ठन जाती है

कुछ कहानियाँ,कुछ नज्में कुछ और हुआ मैं करती थी कुछ और ही अब बन बैठी हूँ सुन लो तुम्हारे आकर्षण में खुद से ही लड़ बैठी हूँ जुल्फ मेरी सुनती ही नहीं और आंचल भी बेलौस उड़े जब होंठ मेरे थर्राते है मुस्काते हो तुम मौन खड़े माथे पे पसीने की बूंदे मोती सी दमकने लगती है बढती धड़कन के... [पूरी पोस्ट]
writer Sonal Rastogi
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[11 Jun 2010 13:20 PM]

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