विनती तुझसे है मेरी,हे मन! ठहर, विश्राम कर ले...

दिल की कलम से... मोहिनी माया के चंगुल मे फँसा, बिखरा, बँटा,मूल कर्तव्यों की रेखा से कभी का तू हटा,अनवरत संघर्ष का क्रम है सतत बस चल रहा,भाग्य पर सब छोड़ के तू क्यूँ स्वयं को छल रहा,तू स्वयं की सोच से भीषण कोई संग्राम कर ले,विनती तुझसे है मेरी,हे मन! ठहर, विश्राम कर... [पूरी पोस्ट]
writer दिलीप
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[11 Jun 2010 12:15 PM]

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