...तो हमारी मदद कौन करेगा?
पिछले हफ्ते की बात है। रात का एक बज चुका था। मैं ऑफिस से घर लौट रहा था। वसई स्टेशन पर ट्रेन से उतरकर ऑटोरिक्शा में बैठा। पांच मिनट में घर पहुंचने वाला था। अचानक सडक़ पर भीड़ दिखी। हमारा रिक्शावाला भी रुक गया। सडक़ चौड़ी करने का काम चल रहा था। इसलिए दोनों...
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भुवेंद्र त्यागी
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[11 Jun 2010 05:00 AM]



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