आए महंत वसंत
आए महंत वसंतमखमल के झूल पड़े हाथी-सा टीलाबैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीलाचंवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनंतआए महंत वसंतश्रद्धानत तरुओं की अंजलि से झरे पातकोंपल के मुँदे नयन थर-थर-थर पुलक गातअगरु धूम लिए घूम रहे सुमन दिग-दिगंतआए महंत वसंतखड़ खड़ खड़ताल...
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Sudeep Dube
kavita
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[11 Jun 2010 02:21 AM]



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