यात्रा मन की

झारखंडी घनश्याम एक बया सा मनचाहता हे सृष्टि रच देनासूरज को दिखाकर दीयासितारों तक डग भर लेनालम्हे गुजरती देखतीं मेरी आंखेंकरना चाहती हैं वक्त का हिसाबऔर फिर समय के डार्क रूम मेंएक्सपोज कर देना सबकुछपुरवाई की ओट में पीठ डालपछुआ को मात देनाऔर तान देना बरगद परसंभावनाओं का... [पूरी पोस्ट]
writer घन्नू झारखंडी
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[11 Jun 2010 02:09 AM]

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