विकलांग [लघुकथा] - सुनीति रावत

साहित्यशिल्पी.इन बस आकर स्टैन्ड पर रूकी| लोग धक्का-मुक्की कर उतरने-चढ़ने लगे| उन्ही में से एक वृद्ध सज्जन भी पैर लचकाते लाठी का सहारा लेकर बस मे चढ़ गये और एक सीट का सहारा लेकर किसी तरह खड़े हो गये। उन्होने सामने नजर उठाई, लिखा था ‘केवल विकलांगों के लिए’| बडी उम्मीद से... [पूरी पोस्ट]
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[10 Jun 2010 20:30 PM]

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