विकास

एक नई शुरुआत विकासअब भी बचे हैं दिए जगमगाते हैं झोंपड़ीनुमा घरों मेंपरों को मोड़कर सीने से लगाए सो रहे बच्चे अक्सर जाग जाते हैं पास से गुजरती रेलगाड़ी की आवाज़ सुनकरदिन भर भी घर्र  घर्रर धरर धरर ....झूँ ..झप... की आवाज़पास के हाईवे... [पूरी पोस्ट]
writer jagdeep singh

कविता

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[10 Jun 2010 12:02 PM]

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