फिर शहर में नाचेंगे ख़ंज़र,फिर शहर में बरसेंगे शोले.
ग़ज़लपत्थर तो उछाले हो मुझ पे, सोचो तो तुम्हारा भी सर है.घर मेरा जलाने से पहले, सोचो तो तुम्हारा भी घर है.फिर शहर में नाचेंगे खंज़र, फिर शहर में बरसेंगे शोले,आने को है मौसम ख़ास कोई, हर शख्श कांपता थर-थर हैक़ातिल भी वही मुंसिफ़ भी वही,इंसाफ़ हमारा क्या...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[10 Jun 2010 09:40 AM]



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