हवाओं के सलाम (फिर एक बार )
जो बैठे थे चमन में हम, बड़ा संजीदा मौसम था,उठे और चल दिए जब फिर , हवाओं के सलाम आयेमुहब्बत भी ज़माने में, बस अब सौदेबाजी है,इधर नज़राना दिल भेजा, उधर से दिल के दाम आयेबहुत था शौक़ जीने का, तो मरने की सज़ा माँगी,रहेंगे दास्ताँ बनकर, शहीदों में जो नाम...
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योगेश शर्मा
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[10 Jun 2010 09:07 AM]



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