उन्मुक्त..

हिंदी हैं हम.. मैंने पंखों को सहेजा है,कल के सारे सपनों को,अपने इर्द गिर्द लपेटा है...एक नन्हे सपने को देने, नई अच्छी सी जमीन,आसमान में उड़ते पंक्षी से,मैंने अपना मुंह फेरा है....रुकने से राहें रूकती नहीं,ना कारवां रुकता है यारों,मंजिलों तक पहुँचता हों,नया रास्ता मैंने... [पूरी पोस्ट]
writer आस्था "देव"
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[10 Jun 2010 07:43 AM]

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