नजर की गुफ्तगू
यूँ ही नहीं ढूँढती हैं आँखें , किसी को बेसबबदिल से दिल की राह जाती है , यूँ झलकजाते हुए जो नजर उठा कर भी न देखा उसनेबिन कहे समझो के हम उसके दिल से गए उतरमायूसी के मन्जर हैं या दिल का कमल खिलाबात इतनी सी पे रिश्तों के मायने जाते हैं बदलनजर की गुफ्तगू नहीं...
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शारदा अरोरा
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[10 Jun 2010 04:57 AM]



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