उंगलियाँ
इस जगह पर आने की कभी भी उसकी इच्छा नहीं थी पर क्या करे। कोई दूसरा विकल्प भी तो उसके पास नहीं था। उस पर बेहोशी के इंजेक्शन का प्रभाव क्रमशः उसी भाँति छाता जा रहा था जिस प्रकार वर्षा ऋतु में बादल धीरे-धीरे सूर्य को अच्छादित कर लेते हैं। उसका अचेतन मस्तिष्क...
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कल्किआन संवादाता
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[10 Jun 2010 01:57 AM]



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