एक सीमाहीन वृत्त
एक धुँधले से आलोक मेंमैंने चाहाउसे घेर लूँएक वृत्त बनकरमैंने यत्न कियाकभी चित्रकारकभी मूर्तिकारकभी कवि बनामेरे सब प्रयासनिष्फल हुएऔर स्वप्न के एक जागरण मेंमैंने देखावह मुझे घेरे हुए हैक्योंकि वह स्वयं एक सीमाहीन वृत्त था...
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डॉ. राजेश नीरव
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[09 Jun 2010 23:09 PM]



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