कविता : एक मकान में चार दुकान
एक मकान में चार दुकान।बनते थे सब में पकवान।।चारो दुकानों में मोटे हलवाई।करते रहते दिन रात लड़ाई॥लड़ाई में क्या होते थे मुद्दे।दुकान में सौदे हो जाते थे मद्दे ॥चारो दुकानों में सन्डे को होता था अवकाश।उस दिन चारों हलवाई नहीं करते थे बकवास॥एक मकान में चार...
[पूरी पोस्ट]
BAL SAJAG
15
1
0
1
3
[09 Jun 2010 14:55 PM]



Shuffle








