काम का भी कोई बहाना बना लो...

चौराहा एक पुराना सेटायर...आबिदा परवीन की गाई एक गजल का शेर आज याद आ रहा है, 'मिलना चाहा तो किए तुमने बहाने क्या-क्या, अब किसी रोज न मिलने के बहाने आओ..। यकीन मानिए, बहानों का बहुत महत्व है। पीने वाले तो बहाने बनाने में महारत रखते हैं। पहले 'आज गम गलत करना है,... [पूरी पोस्ट]
writer चण्डीदत्त शुक्ल

एक पुराना व्यंग्य

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[09 Jun 2010 12:45 PM]

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