समीप तेरे मकाँ खोल दी मैंने !

अंधड़ ! समीप तेरे मकाँ खोल दी मैंने.इक अपनी दुकाँ खोल दी मैंने,चाहे तो जी भर खरीददारी करन चाहे तो फुकां खोल दी मैंने !हुश्न पे जिया जो , हुश्न पे मरेंगा ,वादाखिलाफी न हरगिज करेंगा ,उम्मीदी की जुबाँ खोल दी मैंने,इक अपनी दुकाँ खोल दी मैंने!किसने कहा, कोई ना जानता... [पूरी पोस्ट]
writer पी.सी.गोदियाल

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[09 Jun 2010 13:05 PM]

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