हां..! ये शाम उस शाम से जारी हर शाम पर भारी
हां..! ये शामउस शाम से जारी हर शाम पर भारीजब हुई थी मुलाक़ातखनकती आवाज़ से.... ! आओ..फ़िर उस पहली शाम को याद करें रिक्तता में रंग भरें लौटें उस शाम की तरफ़ जो आज़ हर शाम पे भारी है...!*************************वो जो मुझे खींचता है उस ओर...
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गिरीश बिल्लोरे
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[09 Jun 2010 12:41 PM]



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