हूँ कवि, लेकिन मुझे भी मोतियों की चाह है
हूँ कवि, लेकिन मुझे भी मोतियों की चाह हैहो मेरे घर में उजाले इसकी भी परवाह है मैं भी चाहूँ, भाग्य मेरे साथ में हर दम रहे खेती हंसी की लहलहाए, खुशियों का मौसम रहे कौन कहता है, कवि हो तो रहे फक्कड़ सदा कहने को इक घर तो हो, पर रहे घुमक्कड़ सदा कुर्ता वो पहने...
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योगेश शर्मा
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[09 Jun 2010 09:26 AM]



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