“व्यञ्जनावली-अन्तस्थ” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“य” “य” से यति वो ही कहलाते!जो नित यज्ञ-हवन करवाते!वातावरण शुद्ध हो जाता,कष्ट-क्लेश इससे मिट जाते! “र” “र” रसना को लो जान! रथ को हाँक रहे भगवान! खट्टा, मीठा और चरपरा, सबकी है इसको पहचान! “ल” “ल” से लड्डू और लंगूर! लट्टू घूम रहा भरपूर! काले मुँह वाले वानर...
[पूरी पोस्ट]
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
कविता
13
2
0
2
11
[09 Jun 2010 08:57 AM]



Shuffle








