मैं लड़की होने की सजा पा रही हूँ .....

काव्य मंजूषा 'इज्ज़त' 'आबरू'ये महज शब्द नहीं हैंनकेल हैं,जिनसे बंधा है मेरा वजूदये कील हैं, जिनसे टंगा है मेरा मनये रस्सी है जिससेबंधा है मेरा पेटऔर ये हथकड़ी हैं जिससे बंधे रहते हैंमेरे हाथ-पाँव.... ता-उम्रफिर भी मैं इन्हें बचा रही हूँ.... मैं लड़की होने की सजा पा... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[09 Jun 2010 08:24 AM]

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