दर्द की इक दुकाँ खोल ली मैंने !

अंधड़ ! झंझटों की पोटली मोल ली मैंने,ब्लोगिंग जीवन में घोल ली मैंने,गम खरीदता हूँ, खुशियाँ बेचता हूँ,दर्द की इक दुकाँ खोल ली मैंने !सुबह-शाम कंप्यूटर पर जमे रहकर,वक्त कट जाता है,खुद में रमे रहकर,फुर्सत के हिस्से का परिश्रम बेचकर,यह चीज बड़ी ही अनमोल ली मैंने!दिल... [पूरी पोस्ट]
writer पी.सी.गोदियाल

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[09 Jun 2010 07:39 AM]

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