आंजत-आंजत कानी होगे! - बियंग

गुरतुर गोठ 'जिहां तक नाक के सोझ म देखे के बात हे त इहां के मनखे तो वइसे घलोक नाक के सोझ म नई देख सकय। काबर ते इहां जम्मो चिक्कन-चांदन सड़क मन म कोन मेर जझरंगा भरका होही, गङ्ढा होही तेकर तो ठिकानच नइ राहय त भला बपरा ह अंधमुंदा या सोझ देखत कइसे रेंग सकथे? फेर ये बात... [पूरी पोस्ट]
writer संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari

बियंग

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[08 Jun 2010 23:17 PM]

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